सत्संगति का महत्व और इसके फायदे Satsangati Value Benefits In Hindi
Satsangati Value Benefits In Hindi
सत्संगति किसे कहेंगे ?
इन्द्रियगत व मानसिक सभी प्रकारों व रूपों में अच्छाई के साथ होना ही सत्संगति है। इसमें व्यक्ति, विचार, वस्तुएँ व क्रियाएँ सब कुछ सम्मिलित हैं जो आपमें सकारात्मकताओं व सार्थकताओं को बढ़ायें, जैसे कि प्रभुनाम स्मरण वैचारिक सत्संगति है।
इन्द्रियगत सत्संगति – इसमें स्वाध्याय (ध्यान रखें कि इसका तात्पर्य सांसारिक पुस्तकों की Self – Study नहीं है, वास्तव में वेद-शास्त्र, धर्म साहित्य के अध्ययन को भारत में स्वाध्याय कहा गया था इसमें शामिल है तथा सत्संग भी किन्तु सत्संग को किसी प्रवचनकार की संगति तक सीमित न समझें.
किसी भी भले मानुष की संगति को भी सत्संग कहेंगे। एक व्यक्ति केवल भजन सुनता है तो वह श्रोत्र-सत्संग है, दूसरा व्यक्ति देवी देवताओं के मूर्तियों के दर्शन को लालायित रहता है वह दृष्टि-सत्संगी है।
देवर्षि नारद पिछले से भी पिछले जन्म में एक गन्धर्व थे जो शृंगार रस के गीत गाते हुए एवं अप्सराओं के साथ घूम रहे थे जिससे अभिशापित होकर दरिद्र मानव रूप में धरती पर जन्मना पड़ा.
परन्तु साधु-सन्तों की सत्संगति में रहने से अल्पायु में ही इनमें भी भक्ति जाग उठी एवं अल्पायु में ही मरणोपरान्त आगामी जन्म में ये ब्रह्मदेव के मानसपुत्र नारद के रूप में जन्मे एवं ब्रह्मदेव ने इन्हें सृष्टि निर्माण में सहायक होने के लिये गृहस्थ होने को कहा.
किन्तु ये उन्हें मना करके नारायण भक्ति के प्रचार-प्रसार हेतु ‘नारायण-नारायण’ उच्चारित करते हुए विचरण करने लगे।
मानसिक सत्संगति – इसमें सुनी-पढ़ी-देखी अथवा मन से सोची अच्छी बातों का मनन-चिंतन सम्मिलित है। ध्यान-साधना, एकान्त कीर्तन भी इसमें गिन सकते हैं।
प्रायः व्यक्ति इन्द्रियगत व मानसिक दोनों रूपों में संगति कर रहा होता है, हमें ध्यान रखना होगा कि किसी भी क्षण मानसिक अथवा किसी एक अथवा अधिक इन्द्रियों के स्तर पर तनिक भी कुसंग न हो.
जैसे कि मोबाइल से यथासम्भव दूरी बरतें क्योंकि यह ऐसा निर्जीव कुसंग है तो व्यक्ति को इन्द्रियगत व मानसिक दोनों सुसंगतियों से दूर किये रहता है।
Satsangati Value Benefits In Hindi
कैसे पहचानें सत्संगति को ?
1. सत्संगति में आपको कोई सुप्रेरक नज़र आता है जिसे देख-सुनकर अथवा जिसके कहने पर आप कुछ अच्छा करने को प्रोत्साहित होते हैं।
2. सत्संगति में आप खाली नहीं बैठ सकते, किसी न किसी प्रकार से आपके मन में कुछ परहितकारी करने की उमंग उत्पन्न होगी।
3. सत्संगति आपको कुछ बुरा करने नहीं देगी।
4. सत्संगति आपको कुछ अच्छा करने से नहीं रोकेगी।
5. उपरोक्त लक्षणों से रहित जो कुछ है वह कुसंग है।
सत्संगति की महिमा – संगति बड़ी प्रभावी होती है
1. हिरण्यकशिपु को माता दिति की कुसंगत मिली जिससे वह निर्दय दैत्य बना जबकि प्रह्लाद को देवर्षि नारद का सान्निध्य मिला जिससे वह दैत्यकुल में जन्मने-पलने के बावजूद विष्णु भक्त कहलाया।
6. पुत्रमोही धृतराष्ट्र की दया पर पलने वाले द्रौणाचार्य की मृत्यु कारण अपने स्वयं का पुत्रमोह बना तथा दुर्योधन का दिया दूषित अन्न खा-खाकर भीष्म जैसा व्रती भी द्रौपदी के चीरहरण के प्रयास को देखता रहा, सज्जन कभी दुर्जनों की समीपता स्वीकार नहीं करते.
जब पाण्डवों के शान्तिदूत बन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र के दरबार आये तो उन्होंने दुर्योधन के मेवा त्याग धर्मनिष्ठ विदुर के यहाँ ठहरना व केले का छिलका खाना पसन्द किया।
7. वाल्मीकि पहले लुटेरे थे जो वनमार्ग से गुजर रहे पथिकों को लूटकर अपना कुटुम्ब पालते थे। एक बार उन्होंने देवर्षि नारद को पकड़ लिया तो नारद ने पूछा, ” यह सब अनुचित क्यों करते हो ?
वाल्मीकि बोले – ” अपने परिवार के पालन-पोषण के लिये.
नारद बोले – ” जाओ पूछ के आओ कि क्या तुम्हारे परिजन तुम्हारे पापफलों को भोगने में भी तुम्हारा साथ निभायेंगे ?
नारद को एक वृक्ष से बाँधकर वाल्मीकि ने जब अपने परिजनों से यह प्रश्न किया तो सबने कहा – ” हमें पालना-पोसना तुम्हारा दायित्व है, तुम चाहे ऐसा कैसे भी करो किन्तु तुम्हारे पापकर्मों को भुगतने में हम तुम्हारा साथ नहीं देने वाले “ कुछ क्षणों के लिये देवर्षि नारद की संगति से वाल्मीकि का ऐसा हृदय-परिवर्तन हुआ कि वे भागते हुए आये एवं नारद को बंधन मुक्त करते हुए क्षमा-याचना करने लगे.
इसी घटना के उपरान्त वाल्मीकि ने आदि महाकाव्य रामायण की रचना की। नारायण भक्त देवर्षि को कौन बाँध सकता है, ये तो वाल्मीकि की आत्मा जगाने के लिये पेड़ से बँध गये थे।
8. तुलसीदास बने श्रीराम के दासः एक बार पत्नी रत्ना से मिलने की आतुरता में तुलसीदास सर्प को रस्सी समझ उस पर लटककर भीतर आ गये तो रत्ना ने कहा – ” इतनी आतुरता यदि राम से मिलने की होती तो वे आपको कबके मिल गये होते. इस प्रकार तुलसीदास की जीवनधारा ही बदल गयी एवं अब ये रामचरितमानस की रचना आरम्भ करने लगे।
9. अँगुलिमाल किसी सिद्धि की प्राप्ति के लिये तान्त्रिक कार्यकलाप करते हुए सौ अँगूठों को काट ले जाना चाहता था एवं 99 अँगूठे एकत्र कर भी लिये थे.
एक बार मार्ग में गौतम बुद्ध सामने आ गये परन्तु उन्हें अत्यन्त अभय मुद्रा में देख चकित होकर अँगुलिमाल ने पूछ लिया कि क्या तुम्हें मुझसे भय नहीं लगता तो गौतम बुद्ध बोल पड़े कि यदि मेरा एक अँगूठा लेने से तुम्हें सुख मिलता है तो ले जाओ.
इस प्रकार अब तक राक्षस जैसे व्यवहार वाले अँगुलिमाल की मति ऐसी सुधरी कि तत्काल ही वह गौतम बुद्ध के चरणों में नतमस्तक हो गया एवं एक साधु-सा जीवन व्यतीत करने लगा।
अँगुलिमाल की इस आपबीती से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि कुमार्ग पर चाहे जितना भी समय बीत चला हो, चाहे जीवन को नर्क करने में कोई कमी न रख छोड़ी हो फिर भी जब जागो तभी सवेरा, देर आये दुरुस्त आये.
जो होना था सो हो गया किन्तु अब तो सबकुछ हमारे हाथ में है, जितना जीवन बचा है उसे सँभाल लें, नश्वरता के पीछे भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जितना नाश मचाना था मचा चुके, अब तो प्रभु के मार्ग बढ़ें।
मानव-जन्म, गुरु (सच्चा मार्गदर्शक) एवं मुमुक्षा ( मोक्ष की अभिलाषा ) ये तीन जिन्हें प्राप्त होते हैं वे जीव बड़े दुर्लभ होते हैं. मानवजीवन पाकर भी जो सत्संगरहित अथवा कुसंगी होने में समय व ऊर्जा का तनिक भी नाश करने को तैयार हो जायें ऐसे मानवों को धिक्कार है।
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