महर्षि विश्वामित्र के जीवन की आठ घटनाएँ Maharshi Vishwamitra Best Stories In Hindi
Maharshi Vishwamitra Best Stories In Hindi
राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र ने सिद्ध कर दिखाया कि संध्योपासना व तपस्या के बल पर सब सम्भव किया जा सकता है तथा प्राणी को काम व क्रोध से अपनी शक्ति को बचाकर रखना चाहिए, अन्यथा जीवन की डगर और अधिक समय साध्य व कष्ट साध्य हो जाती है।
एक बार विश्वामित्र वशिष्ठ को मारने के लिये छुपकर आये तो उन्होंने अरुंधति-वशिष्ठ को एकान्त में संवाद करते सुन लिया जिसमें अरुंधति बोलीं – ” पूर्णिमा के चंद्र समान इतना निर्मल कठोर तप करने वाला विश्वामित्र के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ! वशिष्ठ ने सहमति जतायी।
इस प्रकार अपने शत्रुमुख से अपनी प्रशंसा सुनकर विश्वामित्र का हृदय-परिवर्तन हो गया एवं इन्होंने सामने आकर क्षमा माँग ली एवं वशिष्ठ ने उन्हें ‘महर्षि’ कहकर पुकारा, इस प्रकार दोनों के मध्य बैरभाव का अन्त हुआ। विश्वामित्र के जीवन से जुड़ी आठ घटनाओं का विवरण इस रोचक आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है.
Maharshi Vishwamitra Best Stories In Hindi
1. महर्षि विश्वामित्र का जन्म
विश्वामित्र के जन्म के सन्दर्भ में तीन विवरण उपलब्ध होते हैं – एक उल्लेख में इनके पूर्वजों का क्रम प्रजापति-कुष-कुशनाभ-गाधि (गाथिन) विश्वामित्र रहा जिसमें साधना से पूर्व विश्वामित्र को विश्वरथ कहा जाता था जबकि दूसरे उल्लेख में इशीरथ-कुषिक-गाथिन-विश्वामित्र।
तृतीय उल्लेख में भरतवंशी परम्परा में राजा अजमीढ़-जह्नु-सिंधुद्वीप-बलाष्व-बल्लभ-कुषिक-गाधि-विश्वामित्र का क्रम मिलता है। अनेक ग्रंथों में कई विश्वामित्र होने अथवा विश्वामित्र वास्तव में एक उपाधि होने का भी उल्लेख मिलता है (ठीक वैसे ही जैसे कि वेदव्यास व इन्द्र भी उपाधि अथवा पद हैं)।
2. ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का आतिथ्य
जब विश्वामित्र क्षत्रिय राजा थे तो अपनी सेनासहित ये ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के आश्रम से गुजरे तो वशिष्ठ ने इन्हें आतिथ्य स्वीकारने का आमंत्रण दिया परन्तु ” मेरी इतनी बड़ी सेना के लिये व्यवस्था ये कैसे कर पायेंगे ” विचारकर विश्वामित्र ने उनका आमंत्रण अस्वीकार किया.
परन्तु वशिष्ठ के आग्रह के आगे उन्होंने रुकना स्वीकार कर लिया एवं कामधेनुपुत्री नन्दिनी द्वारा समस्त व्यवस्थाएँ की जाने की बात सुन उसे छीन ले जाने को तैयार हो गये एवं नन्दिनी के दैवी बल से बुरी तरह परास्त हुए। सेना का नाश होते देख विश्वामित्र के सौ पुत्र कुपित हो गये व वशिष्ठ का प्राणान्त करने के लिये आगे बढ़े। वशिष्ठ ने उनके एक पुत्र को छोड़ सभी को समाप्त कर दिया।
3. विश्वामित्र का शिवतप
अपने बचे हुए पुत्र को राज-काज सौंप विश्वामित्र स्वयं तपस्या करने हेतु हिमालय के लिये निकल गये। महादेव को प्रसन्न कर इन्होंने विविध दिव्य शक्तियों सहित धनु र्विद्या माँग ली।
4. वशिष्ठ से पुनर्पराजय
तप से प्राप्त शक्ति के बल पर विश्वामित्र वशिष्ठ से प्रतिषोध लेने की इच्छा से निकले; दोनों में बहुत अधिक भयावह युद्ध हुआ एवं विश्वामित्र को पुनः पराजय का मुख देखना पड़ा।
5. विश्वामित्र का पुनर्तप
पुनः पराजित होने से हीनभाव से ग्रसित हुए विश्वामित्र अब ब्रह्माजी की तपस्या करने लगे किन्तु ब्रह्मदेव के मुख से अपने लिये ‘राजर्षि’ सम्बोधन सुन पुनः दुःखी हो गये क्योंकि ये महर्षि-ब्रह्मर्षि वशिष्ठ समान ब्रह्मर्षि बनना चाहते हैं। इस प्रकार ये सोचने लगे कि तप में कोई कमी रह गयी है।
6. मेनका एवं विश्वामित्र
तपस्या के दौरान स्वर्ग से मेनका नामक अप्सरा इनका तपभंग करने के पर्पस से आयी जिसने नृत्य करते हुए अपनी शृंगार पूर्ण भाव-भंगिमाओं से विश्वामित्र को मोहित कर दिया। इस प्रकार ये गृहस्थ से होकर उसके साथ रहने लगे, इस दौरान शकुन्तला नामक पुत्री की प्राप्ति हुई जिसे इन दोनों ने नहीं स्वीकारा एवं शकुन्तला कण्व ऋषि के यहाँ पली एवं ऋषि कण्व की दत्तक पुत्री कहलायी।
यही वह शकुन्तला है जिससे दुष्यन्त ने विवाह किया एवं भरत नामक शूरवीर पुत्र की उत्पत्ति हुई जिसके शासन के कारण यह आर्यावर्त भारतवर्ष कहा जाने लगा। विश्वामित्र को अपने कृत्य का पश्चाताप होने लगा था एवं वे पुन: तपस्या के लिये निकल गये.
7. राजा त्रिषंकु को सदेह स्वर्ग प्राप्ति करायी
त्रिषंकु ने पहले वशिष्ठ से यह विनती की थी कि मुझे सशरीर स्वर्ग पहुँचायें किन्तु वशिष्ठ से उनका कामनात्मक यज्ञ कराना स्वीकार नहीं किया। त्रिषंकु विश्वामित्र के पास गये। वशिष्ठ से अपने पुराने बैर के कारण विश्वामित्र ने त्रिषंकु का निवेदन स्वीकार लिया।
सभी ऋषि इस यज्ञ में आये परन्तु वशिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये जिससे क्रोध के वशीभूत हो विश्वामित्र ने उन्हें समाप्त कर दिया। अपनी इसी भयंकर भूल का बोध हो जाने पर विश्वामित्र ने पुन: तप किया एवं काम के बाद अब क्रोध पर विजय प्राप्त करने से ये ‘ब्रह्मर्षि’ हुए।
विश्वामित्र के आग्रह के बावजूद इन्द्र ने त्रिशंकु को सदेह स्वर्गागमन नहीं करने दिया जिससे विस्तारित स्वर्ग के रूप में एक नवीन स्वर्ग की सृष्टि विश्वामित्र ने कर दी ताकि सदेह स्वर्ग जाने की त्रिषंकु-इच्छा पूर्ण हो सके।
8. श्रीराम के गुरु
विश्वामित्र श्रीराम के द्वितीय गुरु थे। रावण के द्वारा भेजे राक्षसों के कारण विश्वामित्र के यज्ञकार्य निर्विघ्न सम्पादित नहीं हो पा रहे थे। दशरथ से श्रीराम-लक्ष्मण को माँगकर ये दण्डकारण्य में साथ ले आये। राम-लक्ष्मण को इन्होंने अपनी चित्र-विचित्र अलौकिक विद्याएँ प्रदान कीं तथा मिथिला में श्रीराम-सीता विवाह सम्पन्न कराने में महती भूमिका निभायी।
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