पृथ्वीराज चौहान की जीवनी Prithviraj Chauhan history in hindi
Prithviraj Chauhan Bio history in hindi
पृथ्वीराज चौहान कौन थे ?
पृथ्वीराज चौहान साँभर अजमेर दिल्ली राज्य का अधिपति था। पृथ्वीराज चौहान को पृथ्वीराज तृतीय भी कहा गया है। भारत में चौहानवंश का आरम्भ बासुदेव नामक एक व्यक्ति से माना जाता है, इस वंश का अन्तिम राजा पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) था।
पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब हुआ ?
पृथ्वीराज चौहान का जन्म संवत् आनन्द विक्रम-शक 1115 या विक्रमी संवत् 1206 को, कहीं-कहीं 1166 ई. को इनका जन्म दर्शाया गया है। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर-दिल्ली राज्य का अधिपति था। यह शाकम्भरी प्रदेश के चौहान राजा अर्णोराज का पौत्र व महाराज सोमेश्वर का पुत्र था। पृथ्वीराज की माता दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल की छोटी पुत्री कमला देवी थी।
कमला की बड़ी बहन सुर सुन्दरी कन्नौज के राजा विजयपाल से ब्याही थी जिसका पुत्र राजा जयचंद हुआ। राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता पृथ्वीराज की शूरवीरता से मोहित होकर उसकी ओर आकर्षित होने लगी। राजा जयचंद Prithviraj Chauhan का मौसेरा भाई पृथ्वीराज से ईर्ष्या करता था। (कहीं-कहीं पृथ्वीराज की माता कर्पूरी देवी को कहा गया है जो कि कल्चुरी राजा की पुत्री थीं)।
अपने पिता की मृत्यु के उपरान्त 11 वर्ष की आयु में इसने अजमेर का शासन 1169 ई. में सँभाला था. प्रारम्भ में एक वर्ष तक कर्पूरी देवी ने राजकार्य में पृथ्वीराज का सहयोग किया। कहीं-कहीं ऐसा लिखा मिलता है कि चौहानवंशी यह शासक 1173 ई. में सत्तारूढ़ हुआ। अपने जीवनकाल में पृथ्वीराज तृतीय ने 1182 ई. में भण्डानकों का दमन किया। पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय गुजरात का चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय था।
Prithviraj Chauhan Bio history in hindi
कन्नौज के गहढ़वाल वंशीय शासक जयचंद ने संयोगिता का स्वयंवर आयोजित किया जिसमें Prithviraj Chauhan का जन्म का अपमान करने की दृष्टि से उसकी पाषाण मूर्ति स्वयंवर मण्डप के द्वार पर लगवा दी। संयोगिता ने उस मूर्ति को अपनी वरमाला पहना दी। पृथ्वीराज ने इस स्वयंवर स्थल से संयागिता का हरण कर लिया। इससे राजा जयचंद के मन में प्रतिशोध की आग भभकने लगी।
इसने पृथ्वीराज के शत्रु गजनी के सुल्तान शाहबुद्दीन मुहम्मद गोरी से दोस्ती कर ली व इसे पृथ्वीराज को परास्त करने आमन्त्रण भेजा। तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ईसा ) में पृथ्वीराज ने तुर्क आक्रमणकारी शाहबुद्दीन मुहम्मद गोरी को भीषण रूप से परास्त किया।
भारत में मुहम्मद गोरी इस पराजय से पहले भी पराजित हो चुका था किन्तु इस बार पृथ्वीराज से युद्ध में उसे बन्दी बना लिया गया परन्तु गोरी ने क्षमा याचना का स्वांग रचकर स्वतन्त्रता माँग ली एवं बाद में पानीपत के ही पास फिर से आक्रमण किया।
अब की बार तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ईसा) में शाहबुद्दीन पृथ्वीराज को सिरसा के समीप बन्दी बना अपने नियन्त्रण में लेकर गजनी अफ़गानिस्तान ले जाने में सफल हो गया। पृथ्वीराज से दूसरे युद्ध के लिये शाहबुद्दीन अपनी सेना का पुनर्गठन करके आया था.
जबकि शाहबुद्दीन से प्रथम युद्ध में विजय के उपरान्त Prithviraj Chauhan ने सैन्य संगठन व शस्त्रों की ओर उदासीनता बरती एवं राजपूत राजाओं में पारस्परिक मतभेद इतने बढ़ गये थे कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति असावधानी बरती जाने लगी।
इस पराजय के बाद भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना मानी जाती है. भारत में तुर्की राज्य की स्थापना के रूप में। इस प्रकार उत्तर भारत शाहबुद्दीन के हाथ चला गया। दिल्ली पर गोरियों का वर्चस्व हो गया। शाहबुद्दीन अपने विजित प्रदेशो का नियन्त्रण कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपकर वापस चला गया।
पृथ्वीराज के नेत्र-गोलक निकलवा दिये। एक अन्य विवरण के अनुसार हसन निज़ामी का कहना था कि पृथ्वीराज चौहान का जन्म मुहम्मद गोरी के साथ अजमेर गया व उसने गोरी की अधीनता स्वीकार कर ली तथा गोरी के अधीनस्थ कुछ वर्षों तक शासन किया।
पृथ्वीराज ने जब विद्रोह के लिये षड्यंत्र किया तो पृथ्वीराज को मृत्युदण्ड दे दिया गया। कहीं-कहीं पृथ्वीराज को ‘भारतीय यश गौरव का अन्तिम सूर्य’ कह दिया जाता है। इसने दिल्ली व अजमेर पर शासन किया तथा समाकालीन मुस्लिम इतिहासकार उसे ‘रायपिथौरा’ भी कहते थे।
पृथ्वीराज का बाल-मित्र तत्कालीन कविराज चन्दवरदायी एक शूरवीर के रूप में कई युद्धों में पृथ्वीराज के साथ रह चुका था. यह शाहबुद्दीन से पृथ्वीराज को छुड़ाने गजनी चला गया।
एक अन्य विवरण के अनुसार Prithviraj Chauhan के साथ ही चन्दवरदायी को भी बन्दी बना गोरी ले गया था। चन्दवरदायी ने शाहबुद्दीन को तैयार कर ही लिया कि पृथ्वीराज को शब्दभेदी बाण चलाने का अभ्यास है जिससे वह नेत्रों के बिना ही यह अद्भुत व रोचक कार्य कर सकता है चाहो तो कराके देख लो।
कुतूहलवश शाहबुद्दीन जब पृथ्वीराज का यह अभ्यास देखने महल की छत पर बैठा था तो चन्दवरदायी ने पृथ्वीराज के कान में बोला –
” चार बाँस चौबीस गज, अँगुल अष्ट प्रमाण. ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान !
शाहबुद्दीन ने ज्यों ही पृथ्वीराज को तीर चलाने को कहा वैसे ही पृथ्वीराज ने तीर छोड़ा जो शाहबुद्दीन की गर्दन में जाकर लगा। शाहबुद्दीन की मृत्यु हुई व चन्दवरदायी व पृथ्वीराज ने एक-दूसरे की छाती में कटार भौंक दिया। कुछ इतिहासविदों को ऐसा कहना है कि शाहबुद्दीन की मृत्यु पृथ्वीराज का तीर लगने से नहीं बल्कि गक्खरों गक्खड़ों के हाथों हुई थी।
गक्खर वर्तमान के पाकिस्तानी पंजाब में बसा एक पंजाबी समुदाय है, इस पुराने समुदाय में आधुनिक काल में मुस्लिम बहुसंख्यक व हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। इनमें से अधिकांश ने बारहवीं से चौदहवीं शताब्दी में हिन्दू से मुस्लिम सम्प्रदाय में प्रवेश किया।
पृथ्वीराज तृतीय से जुड़े कुछ विवरण ग्रंथ –
चौहान वंश के अन्तिम शासक के रूप में पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने अपने दरबार में चन्दवरदायी व जयानक नामक कवियों को प्रश्रय प्रदान किया था जिन्होंने क्रमश ‘पृथ्वीराज रासो’व ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की। चन्दवरदायी ने ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखा जिसे उसके पुत्र कल्हण ने पूर्ण किया था।
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Bhai aapne to meri guest post publish hi nahi kari,