भीष्म पितामह के बारे में सम्पूर्ण जानकारी Bhishma Pitamah Life Essay Biography in Hindi
पृथ्वी अपने गंध को, अग्नि अपने ताप को, आकाश शब्द को, वायु स्पर्श को, जल नमी को, चन्द्र शीतलता को, सूर्य तेज को, धर्मराज धर्म को छोड़ दे किन्तु भीष्म तीनो लोको के राज्य या उससे भी महान सुख के लिए अपना व्रत नहीं छोड़ेगा. यह कथन उस महान दृढव्रती भीष्म का है जिसने अपने पिता के सुख के लिए आजन्म अविवाहित रहने की दृढ प्रतिज्ञा की थी.
Bhishma Pitamah Life Essay in Hindi
पंचतत्व – पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु.
पंचतत्व के गुण – गंध, शब्द उष्णता, नमी, स्पर्श..
भीष्म हस्तिनापुर के महाराज शान्तनु व गंगा के पुत्र थे. कौरवो और पांडवो के पितामह होने के कारण इन्हें पितामह भी कहा जाता है. भीष्म के बचपन का नाम देवव्रत था. इन्होने वेदशास्त्र की शिक्षा वशिष्ठ से प्राप्त की थी. युद्ध व शस्त्र विद्या की शिक्षा इन्हें परशुराम से मिली थी. ये शस्त्र और शास्त्र दोनों में अत्यंत निपुण थे.
एक बार की बात है महाराज शान्तनु आखेट के लिए गये. शिकार करते – करते वह यमुना नदी के तट पर पहुँच गये. वहां उन्होंने एक परम सुंदरी कन्या को देखा और उस पर मुग्ध हो गये. महाराज शान्तनु ने उस कन्या के पिता निषादराज से विवाह की इच्छा व्यक्त की.
निषादराज ने कहा – ” मैं एक शर्त पर अपनी कन्या का विवाह आपसे कर सकता हूँ की राजा की मृत्यु के पश्चात मेरी कन्या का पुत्र गद्दी पर बैठेगा, देवव्रत नहीं. महाराज शान्तनु अपने पुत्र का यह अधिकार नहीं छिनना चाहते थे.
इसलिए वे हस्तिनापुर लौट आये. धीरे – धीरे महाराज की दशा सोचनीय होती गई. देवव्रत ने पिता की चिंता का कारण पता किया और निषादराज से अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह अपने पिता से करने का अनुरोध किया. भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि –
भीष्म की प्रतिज्ञा
” मैं शान्तनु पुत्र देवव्रत आज यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए हस्तिनापुर राज्य की रक्षा करूँगा. इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा. तत्पश्चात राजा शान्तनु का विवाह सत्यवती के साथ हो गया. सत्यवती के दो पुत्र हुए. एक का नाम था चित्रांगद और दूसरे का नाम था विचित्रवीर्य. शान्तनु की मृत्यु के पश्चात् सत्यवती का बड़ा पुत्र हस्तिनापुर का राजा हुआ किन्तु शीघ्र ही एक युद्ध में उसकी मृत्यु हो गयी.
उसकी मृत्यु के बाद दूसरा पुत्र सिहांसन पर बैठा इसके तीन पुत्र थे- धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर. दुर्भाग्यवश वह भी थोड़े समय में काल – कवलित हो गया. अब कौन सिंहासन पर बैठे ? कोई दूसरा उत्तराधिकारी नहीं था. इसलिए सबने भीष्म से राज्य स्वीकार करने का आग्रह किया परन्तु भीष्म ने इसे अस्वीकार कर दिया.
उन्होंने कहा – ” मनुष्य की प्रतिज्ञा सींक नहीं है जो झटके से टूट जाया करती है. जो बात एक बार कह दी गई उससे लौटना मनुष्य की दुर्बलता है, चरित्र की हीनता है.”
भीष्म के चरित्र की यह विशेषता थी की जो प्रतिज्ञा कर लेते थे, उससे नहीं हटते थे. उनके जीवन में इस प्रकार के अनेक उदहारण है. जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ हुआ तो भीष्म कौरवो की ओर थे. कृष्ण पांडवो की ओर थे. युद्ध के पूर्व कृष्ण ने कहा ” मैं अर्जुन का रथ हाकूँगा पर लडूँगा नहीं. भीष्म ने प्रतिज्ञा की ” मैं कृष्ण को शस्त्र उठाने को विवश कर दूंगा.
” आज जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊं,
तौ लाजों गंगा जननी को शान्तनु सूत न कहाऔं..
अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए भीष्म ने इतना घोर संग्राम किया की पांडव सेना व्याकुल हो उठी. श्री कृष्ण क्रोधित हो गये और अर्जुन का रथ त्यागकर रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़े. भीष्म की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई.
श्री कृष्ण ने भीष्म के पराक्रम और युद्ध कौशल की अत्यधिक प्रशंसा की. भीष्म अत्यंत पराक्रमी थे. महाभारत के युद्ध में इन्होने 10 दिन तक अकेले सेनापति का कार्य किया. कोई भी ऐसा योद्धा नहीं था जो भीष्म के शौर्य को ललकार सके.
” मैं शिखन्डी को सम्मुख देखकर धनुष रख देता हूँ – अपनी मृत्यु का उपाय बताना भीष्म की ही उदारता थी. शिखन्डी स्त्रीरूप में जन्मा था. कोई सच्चा शूर नारी पर प्रहार कैसे कर सकता था ? अर्जुन ने शिखण्डी को आगे कर पितामह पर बाणों की वर्षा की. जब भीष्म रथ से गिरे, उनके शरीर का रोम – रोम बिंध चूका था. पूरा शरीर बाणों पर ही उठा रह गया. भीष्म ने घायल अवस्था में ही सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने प्राण न त्यागने की प्रतिज्ञा की.
सूर्य की किरणे एक वर्ष में 6 माह भूमध्यरेखा के उत्तर में तथा 6 माह भूमध्यरेखा के दक्षिण में लम्बवत पड़ती है. सूर्य के भूमध्यरेखा को दोनों ओर स्थित रहने की इस दशा को सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है.
भीष्म पितामह प्रबल पराक्रमी होने के साथ – साथ महान राजनीतिज्ञ और धर्मज्ञ भी थे. शरशय्या पर पड़े भीष्म ने युधिष्ठर को ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, धर्म व नीति का जो उपदेश दिया, वह महाभारत के शान्तिपर्व में संग्रहित है.
पितामह भीष्म के उपदेश मील के पत्थर की तरह सदैव मानवजाति का पथ प्रशस्त करते रहेंगे. भीष्म के समान दृढप्रतिज्ञ व्यक्ति किसी भी देश और समाज को सदैव नयी दिशा देते रहते है.
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